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13/08/2021 By shiv3376 0

जल Water

जल Water

स लेख में हम जल और उसके स्त्रोत व संरक्षण के बारे में पढ़ेंगे।

सभी सजीवों के लिए जल अतिआवश्यक है। हमारी पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग जल से ढका है। इसका अधिकांश भाग महासागरों और समुद्रों में है। झीलों, नदियों, बर्फ के मैदानों और ग्लेशियरों के साथ ही हवा में भी जल वाष्प के रूप में जल होता है। जल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाता है।

जल-चक्र (Water Cycle)

जल महासागरों से उठकर हवा में मिल जाता है। वहाँ से भूमि अथवा समुद्रों में यह बरस जाता है। वर्षा का जल पुनः नदियों के माध्यम से समुद्रों तक पहुँचता है। जल के इस चक्र को ही जल-चक्र कहते हैं। इसका न तो कोई आरम्भ है और न अंत।

वाष्पीकरण और वर्षा (Evaporation and Precipitation)

सूर्य की किरणें महासागर के जल पर पड़ती हैं जिससे वाष्पीकरण होता है। महासागर का जल सूर्य की किरणों की गर्मी से वाष्प में बदल जाता है।

जब जल वाष्प उच्च वातावरण में पहुँचती है, संघनन आरम्भ हो जाता है। यह जल वाष्प को छोटी बूंदों या बर्फ के सूक्ष्म क्रिस्टलों में बदल देता है

जो हवा में मेघों के रूप में तैरते है। छोटी बूंदें या बर्फ के सूक्ष्म क्रिस्टल बड़े होते हैं तो वे धरती पर वर्षा के रूप में गिरते हैं। जब बहुत वर्षा होती है तो कुछ जल भूमि में चला जाता है, कुछ जल धाराओं में बह जाता है

और कुछ सतह पर तालाबों और झीलों के रूप में रह जाता है। नदियाँ या धाराएँ धरती की सतह पर बहती हैं और समुद्रों या महासागरों से जा मिलती हैं।

भूमिगत जल (Ground Water)

जब वर्षा का जल भूमि द्वारा सोख लिया जाता है तो इसे भूमिगत जल कहते हैं। यह पीचों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) पौधे भूमिगत जल को जड़ों द्वारा सोखते हैं और जल वाष्प के रूप में हवा को पत्तियों के माध्यम से लौटाते हैं। पौधे के इस कार्य के द्वारा पानी का लौटाना ही वाष्पोत्सर्जन कहलाता है।

हिमनद (Glacies)

कम ताप के क्षेत्रों में जल बहुत धीमे चलता है क्योंकि यह बर्फ के रूप में होता है। उच्च अक्षांश और उच्च शीर्षलम्ब में पाई जाने वाली बहती हुई बर्फ की नदी को हिमनद कहते हैं।

जल खर्च विवरण (Water Budget)

जल की पृथ्वी पर विभिन्न प्रकारों में पाई जाने वाली कुल मात्रा, जो जल वाष्प या जल है, स्थिर रहती है। इस प्रकार धरती जल के बजट पर है जहाँ वर्षा तो आय है जबकि वाष्पीकरण या वाष्पोत्सर्जन खर्च है।

कुछ क्षेत्रों में बसंत ऋतु में या भारी वर्षा में बर्फ का पिघलना उस क्षेत्र में अधिक जल ला सकता है जिससे बजट बिगड़ जाता है। लेकिन इसके विपरीत भी होता है।

ग्रीष्म में, वाष्पीकरण बढ़ सकता है जिससे मौसम शुष्क हो सकता है और जल की आपूर्ति रुक सकती है। यद्यपि हम धरती के जल बजट को बदल नहीं सकते परंतु हम इसके उपयोग पर नियंत्रण कर सकते हैं।

शहरों और उद्योगों द्वारा बड़ी मात्रा में जल का उपयोग अपशिष्ट के रूप में नदियों और समुद्रों में लौटता है। उनमें अक्सर हानिकारक पदार्थ होते हैं।

जल संरक्षण (Water Conservation)

हम जल की मात्रा को बढ़ा नहीं सकते क्योंकि यह सीमित है। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकता की पूर्ति के लिए हमें पर्याप्त जल मिले, इसके लिए हमें जल का सावधानीपूर्वक प्रयोग करना चाहिए। जल संरक्षण हमारे जीवन का एक अंग होना चाहिए।

जल मण्डल (Hydrosphere)

पर्यावरण के तीन आधार-स्थल मण्डल, जल मण्डल और जैव मण्डल पृथ्वी पर जीवन के लिए उत्तरदायी है। परंतु जल मण्डल को विशेष महत्त्व दिया गया है

क्योंकि पृथ्वी पर जीवन जल में उत्पन्न हुआ है। यहाँ तक कि आज भी जल में रहने वाले जीवों की संख्या अन्य क्षेत्रों में रहने वाले जीवों से अधिक है।

जल जीवन के लिए अपरिहार्य है। पीथे, जीव, मानव जल के बिना नहीं रह सकते।

कार्बन डाईआक्साइड के साथ ही जल वाष्प भी वातावरण में ताप के नियंत्रण के लिए समान रूप से उत्तरदायी है। इस प्रकार से जल मण्डल का प्रभाव वातावरण पर पड़ता है।

जल की उपस्थिति से पृथ्वी नीली चमक के साथ अंतरिक्ष से चमकती दिखती है। इसलिए पृथ्वी को नीला ग्रह भी कहा जाता है। इसे जलीय ग्रह भी कहा जाता है क्योंकि केवल पृथ्वी पर ही जल मण्डल है।

स्वच्छ और लवणीय जल (Fresh and Saline Water)

महासागरों का जल लवणीय होता है जबकि नदियों, तालाबों, झीलों, कुओं आदि का जल स्वच्छ और मीठा होता है। महासागरों और समुद्रों का जल लवण के कारण नमकीन होता है।

समुद्रों में चट्टानों और नदियों द्वारा बहाकर लाए गए खनिजों के कारण वहाँ पर लवण बढ़ता है।

लवणीयता के कारण (Causes of Salinity)

1. लवण की मात्रा हर समुद्र में भिन्न होती है। समुद्रों और महासागरों की लवणीयता स्वच्छ जल के बढ़ने, वाष्पीकरण और समुद्र धाराओं के कारण प्रभावित होती है। जब नदियाँ बड़ी मात्रा में स्वच्छ जल उड़ेलती हैं तो यह कम रहती है।

2. वाष्पीकरण की दर भी समुद्रों की लवणीयता को प्रभावित करती है। अत्यधिक वाष्पीकरण के कारण समुद्रों में लवण की प्रतिशतता बढ़ती है।

इसलिए समुद्रों की लवणीयता गर्म क्षेत्रों के निकट होने के कारण औसत से अधिक रहती है।

3. की धाराएँ भी लवणीयता को प्रभावित करती हैं। ध्रुवीय क्षेत्रों से स्वच्छ जल भूमध्य क्षेत्र तक धाराओं द्वारा लाया जाता है।

भूमध्य रेखा के पास का लवणीय जल ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर वितरित होता है।

लवणीयता की मात्रा (Quantity of Salinity)

महासागरीय जल में उपस्थित लवण की मात्रा को लवणीयता कहते हैं। क्योंकि इन क्षेत्रों में कई नदियों और वर्षा कम है, इसलिए ताप सामान्यतः उच्च रहता है।

लवणीयता उन सागरों में अधिक होती है जो आंशिक रूप से मैडिटेरिनियन सागर, लाल सागर और पर्शियन गल्फ जैसे क्षेत्रों से घिरे होते हैं। मृत सागर में अधिकतम लवणीयता है।

मुख्य जल स्रोतों का वितरण (Distribution of Major Water Bodies)

महासागर पृथ्वी पर मुख्य जल स्रोत है। पृथ्वी पर पाँच महासागर हैं

1. प्रशान्त महासागर

2. अटलांटिक महासागर

3. हिंद महासागर

4. आर्कटिक महासागर

5. एंटार्कटिक महासागर

1. प्रशान्त महासागर (Pacific Ocean):

यह विशाल जल स्रोत पूर्वी एशिया की खाड़ी और आस्ट्रेलिया तथा उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका की पश्चिमी खाड़ी के मध्य स्थित है।

यह पृथ्वी का सबसे बड़ा महासागर है जो पृथ्वी का एक तिहाई भाग ढक लेता है। इसकी औसत गहराई 5000 मीटर है। प्रशान्त महासागर में लगभग 20000 द्वीप है।

2. अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean)

यह पृथ्वी का दूसरा सबसे बड़ा महासागर है जो पृथ्वी का एक बटा छह भाग ढक लेता है। पृथ्वी का लगभग आधा हिस्सा प्रशान्त और अटलांटिक महासागर द्वारा ढका है।

अटलांटिक महासागर की औसत गहराई 4000 मीटर है। इसमें बहुत कम द्वीप हैं।

3. हिंद महासागर (Indian Ocean)

यह विश्व का तीसरा बड़ा महासागर है जो दक्षिणी भारत से एंटार्कटिका महाद्वीप तक फैला है। इसकी औषत गहराई 4000 मीटर है।

यह पृथ्वी का लगभग 14.6 भाग ढकता है। एशिया के दक्षिणी भाग में इस महासागर में कई बड़े और छोटे द्वीप है। हिंद महासागर का सबसे बड़ा द्वीप मेडागास्कर है। जाता है क्योंकि यह उत्तरी

4. आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean)

यह विश्व का सबसे छोटा महासागर है। इसे उत्तरी व महासागर भी कहा जाता है यह ध्रुव को चारों ओर से घेरता है। इसका जल वर्ष भर जमा रहता है।

5. अंटार्कटिक महासागर (Antarctic Ocean)

अंटार्कटिक महाद्वीप के चारों ओर के समुद्री क्षेत्र को अंटार्कटिक महासागर कहा जाता है। वस्तुतः यह प्रशान्त, अटलांटिक और हिंद महासागर के दक्षिणी किनारों से बना है,

इसलिए बहुत से भूवैज्ञानिक इसे महासागर नहीं मानते। इसको दक्षिण ध्रुवीय महासागर भी कहते हैं।

महासागर के जल की विशेषताएँ

1. महासागरीय धारा के द्वारा महासागर भूमि के ताप पर नियंत्रण रखता है।

2. महासागर का जल, स्रोतों के भण्डार; जैसे जीवाश्म ईंधन, समुद्री भोजन, धातुएँ

3. महासागर का जल वाष्पोत्सर्जन के एक माध्यम की तरह कार्य करता है।

4. महासागर का जल बिजली उत्पादन में भी प्रयोग किया जा सकता है।

महासागर के जल का फैलाव (Circulation of Ocean Water)

महासागरों और समुद्रों का जल कभी विश्राम नहीं करता। यह निरंतर बढ़ता रहता है। महासागर का जल तीन प्रकार की गतियाँ रखता है:

1. लहरें (Waves)

लहरे महासागर के जल की सतह पर ऊपर नीचे होने को कहते हैं। लहरें अनेक कारणों से उत्पन्न होती हैं।

हवा के बहने के द्वारा उत्पन्न एक खिंचाव लहरों की गति का महत्वपूर्ण कारण है।

इसके कारण जल एक लहर में उठता और गिरता है। लहर के उठे हुए भाग को शिखर और निचले भाग को गर्त कहते हैं।

लहरें जल को सामानांतर नहीं ले जाती।

मौसम की स्थिति भी लहरों के परिमाण का निर्धारण करती है। तूफानी लहरें बहुत ऊँची और विध्वंसक होती है। गर्मी के महीनों में चक्रवात बहुत ऊँची लहरें उत्पन्न करता है।

जब भारत की पूर्वी खाड़ी जैसे भागों में एक से अधिक चक्रवात आ जाते हैं तो जीवन और सम्पत्ति की बड़ी हानि होती है।

2. ज्वार भाटा (Tides)

समुद्र के जल का एकांतर उठने व गिरने को ज्वार कहते हैं। ये चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण होता है।

ज्वार भाटा के प्रकार (Kinds of Tide)

(i) उच्च ज्वार भाटा (High Tides) जब समुद्र के जल का स्तर उच्चतम होता है तो इसे उच्च ज्वार भाटा करते हैं।

(ii) निम्न ज्वार भाटा (Low Tides) जब समुद्र के जल का स्तर निम्नतम होता है तो इसे निम्न ज्वार भाटा करते हैं।

(iii) स्प्रिंग ज्वार भाटा (Spring Tides) जब ज्वार भाटा साधारण से उच्च परिमाण का होता है, इसे स्प्रिंग ज्वार भाटा कहते है

स्प्रिंग ज्वार भाटा तब आता है जब सूर्य, पृथ्वी व चंद्रमा एक ही रेखा में होते हैं। यह पूर्णिमा और नव चंद्र के दिनों में आता है।

(iv) लघु ज्वार भाटा (Neup Tides) जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक त्रिभुज के तीन कोण बनाते हैं चंद्रमा और सूर्य का आकर्षण एक दूसरे को काटता है यह चंद्रमा के प्रथम व तृतीय पक्ष में होता है।

इस समय पर ज्वार भाटा दुर्बल होता है और लघु ज्वार भाटा कहलाता है।

ज्वार भाटा का महत्त्व (Importance of Tides)

(i) समुद्र परिवहन (Sea Navigation):

उच्च लघु ज्वार भाटा के समय पर खाड़ी निकट के क्षेत्रों की गहराई बढ़ जाती है और बड़े जहाज बंदरगाह में आ जाते हैं।

गुजरात का कांदला और वेस्ट बंगाल का डायमंड हार्बर ज्वार भाटा के कारण ही कार्य करते हैं।

(ii) नदी परिवहन (River Navigation)

ज्वार भाटा नदियों को भी परिवहन के योग्य बनाता है क्योंकि उच्च ज्वार भाटा के समय नदी की गहराई भी बढ़ जाती है।

(iii) बंदरगाहों पर गाद जमने से रोकना (Preventing Silting of Harbours)

ज्वार भाटा बंदरगाहों पर नदियों द्वारा लाए गए कीचड़ को हटा कर गाद जमने से रोकता है।

(iv) विद्युत उत्पादन (Generation of Electricity)

ज्वार भाटीय धाराओं को विद्युत उत्पादन के लिए संचालित किया जाता है। संसार का प्रथम विधुत उत्पादन केंद्र फ्रांस में 1966 में आरंभ किया गया इसके 24 जनरेटर 240000 किलोवाट विधुत उत्पन्य करते थे

(v) मछुआरों की मदद (Help to Fishermen)

महुआरे प्यार भाटा का उपयोग मछली पकड़ने में करते हैं। वे ज्वार भाटा के समय समुद्र से अपेक्षाकृत अधिक मछलियाँ पकड़ते हैं।

3. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)

महासागरीय धाराएँ महासागरीय जल के बड़े पैमाने पर एक निश्चित दिशा में बहने को कहते हैं, जैसे समुद्र में नदियाँ। महासागरीय धाराएँ हज़ारों किमी लम्बी और कभी-कभी 200 किमी चौड़ी होती हैं।

एक धारा में जल 2 से 10 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से बढ़ता है। अपवहन जब महासागर की सतह पर बहते जल का परिमाण मंद और छिछला होता है तो इसे अपवहन कहते हैं। अपवहन की गति 1 से 3 किमी प्रतिदिन होती है।

धाराओं के प्रकार (Kinds of Currents)

1. ऊष्ण धाराएँ (Warm Currents)

यह भूमध्य रेखा के निकट उत्पन्न होती हैं और ध्रुवों की ओर बहती हैं।

2. ठण्डी धाराएँ (Cold Currents)

ये उच्च अक्षांश में उत्पन्न होती हैं और भूमध्य रेखा की ओर बहती हैं।

महासागरीय जल धाराओं के कारण (Causes of ocean Currents)

1. समुद्र जल के घनत्व में भिन्नता (Difference in Density of Sea Water)

महासागरीय जल में समुद्र जल के घनत्य ताप और लवणीयता में भिन्नता उत्पन्न होती है।

2. प्रबल हवाएँ (Prevailing Winds)

प्रबल हवाएँ एक दिशा विशेष में निरंतर बहती रहती हैं और सतह के जल को घर्षण के कारण खींचती है। यह महासागर की धाराएँ उत्पन्न करता है।

3. पृथ्वी का अपने अक्ष पर घुमाव (Rotation of Earth Around its Axis)

यह भी महासागर में धाराएँ उत्पन्न करता है।

महासागर की धाराओं का मुड़ना (Influence of Ocean Currents)

महासागरीय धाराएँ जलवायु, कृषि और खाड़ीय प्रदेशों व अन्य द्वीपों की, जिनके निकट वे बहती है, आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती हैं।

जलवायु (Climate)

(i) उष्मा (Warmth)

ऊष्ण धारा जलवायु को गर्म कर देती है। उदाहरण के लिए प्रशान्त महासागर की कुरोशिया धारा जापान में और अटलांटिक महासागर की गल्फ स्ट्रीम अमेरिका के पूर्वी भाग में जलवायु को बदल देती हैं।

(i) बर्फ से मुक्त (Free From Ice)

ऊष्ण धाराएँ ध्रुवीय क्षेत्रों के बंदरगाहों को शीतकाल में भी बर्फ से मुक्त रखती हैं। उदाहरण के लिए आर्कटिक घेरे में नार्वे की खाड़ी शीतकाल में भी नार्थ अटलांटिक ड्रिफ्ट के कारण बर्फ से मुक्त रहती है।

(ii) हिमीकरण (Frozen)

दूसरी ओर ठण्डी लैब्राडोर धारा के कारण लेब्राडोर खाड़ी जमी रहती है।

वर्षा की मात्रा (Amount of Rainfall)

धाराएँ एक देश द्वारा प्राप्त वर्षा की मात्रा को प्रभावित करती हैं। ऊष्ण धारा से प्रभावित देशों में अधिक वर्षा होती है क्योंकि उन पर गुजरने वाली हवाऐं बहुत-सी नमी सोख लेती हैं।

पूर्वी अमेरिका, आयरलैण्ड और ब्रिटेन में ऐसी ही वर्षा होती है। दूसरी ओर दक्षिणी अमेरिका का अटाकामा रेगिस्तान गर्म रहता है

क्योंकि ठण्डी धाराओं की ऊपर बहती हवाएँ नमी नहीं सोख पातीं। आंशिक रूप से अन्य रेगिस्तानों पर भी लागू होता है।

प्लवक का उत्पादन (Production of Plankton)

प्लवक सूक्ष्म समुद्री जीव हैं जो मछलियों का भोजन हैं। ऊष्ण और ठण्डी धारा का मिश्रण प्लवकों के उत्पादन में मदद करता है। प्लवकों वाले क्षेत्र संसार के बड़े मछली उत्पादक क्षेत्र है।

कोहरे की रचना (Creation of Fog)

ऊष्ण और ठण्डी धारा का मिश्रण उस क्षेत्र में घना कोहरा उत्पन्न करता है। यह जहाजों के लिए अत्यंत घातक है क्योंकि दृश्य स्पष्टता कम हो जाती है।

ऐसा ही एक क्षेत्र न्यूफोडलैंड के निकट है जहाँ ऊष्ण गल्फ स्ट्रीम ठण्डी लेब्राडोर धारा से मिलती है।

परिवहन (Navigation)

धाराएं परिवहन को प्रभावित करती है, क्योंकि धारा से दूर जा रहा जहाज़ निश्चित ही तेज़ी से जायेगा। यह समय तथा ईंधन बचा सकती है।

हिमनदों का पिघलना (Melting Icebergs)

हिमनद जहाज़ों के लिए घातक हो सकते हैं। ऊष्ण थारा उन्हें पिघलने में मदद करती है।

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