मुद्रा एवं बन्ध
01/08/2021 By shiv3376 0

मुद्रा एवं बन्ध तथा शुद्धि क्रियाएँ


मुद्रा (Currency)

मुद्रा एवं बन्ध तथा शुद्धि क्रियाएँ

योग शिक्षा के अन्तर्गत मुद्राएँ अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। योगासन से शरीर सुदृढ़ होता है तथा मुद्राओं के द्वारा परम सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती है। मुद्राओं के अभ्यास से स्वास्थ्य की वृद्धि तो होती ही है साथ ही आंतरिक शुद्धता व मानसिक बल भी प्राप्त होता है। मुद्राओं का ज्ञान अति प्राचीन है। मन को एकाग्र करने के लिये मुद्राएँ अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वैसे तो मुद्राएँ अनेक प्रकार की होती हैं, परन्तु इस भाग में हम कुछ निम्न मुद्राओं के संदर्भ में विचार करेंगे।

1. प्रणाम मुद्रा / नमस्कार मुद्रा

सर्वप्रथम हम पद्मासन अथवा सुखासन में बैठ जायें। पश्चात् दोनों हाथों को प्रणाम की स्थिति में ले आयें। दोनों हाथों के अँगूठे सूर्यचक्र पर नेत्रों को कोमलता के साथ बन्द करें तथा संपूर्ण ध्यान दोनों नेत्रों के मध्य आज्ञाचक्र पर केन्द्रित करें। इस स्थिति में प्रारम्भ दो से तीन मिनट करें तथा धीरे-धीरे 15 से 20 मिनट तक कर सकते हैं।

2. योग मुद्रा

पदमासन अथवा सुखासन में बैठ जायें। दोनों हाथों को घुटनों पर रखें। अँगूठे व तर्जनी उँगुली के ऊपरी हिस्से को आपस में दबायें हाथ सीधे मेरुदंड सीधा रखें नेत्रों को कोमलता के साथ बन्द करें, ध्यान को आज्ञाचक्र पर केन्द्रित करें। अभ्यास तीन मिनट से प्रारम्भ करके तीस मिनट तक बढ़ाया जा सकता है। स्मरण शक्ति के लिये बहुत अच्छा अभ्यास है।

3. चिन मुद्रा

पद्मासन या सुखासन में बैठ जायें। दोनों हाथों को सीधे घुटनों पर रखना। हथेली नीचे की ओर। अँगूठे व अनामिका अँगुली के ऊपरी हिस्से को कसकर दबाना। नेत्रों को कोमलता के साथ बन्द करके ध्यान आज्ञाचक्र पर केन्द्रित करना। अभ्यास उपरोक्त मुद्राओं की भाँति 3 मिनट से 30 मिनट तक करना चाहिए।

4. ब्रह्मांजलि मुद्रा

पदमासन या सुखासन में बैठ जायें। मेरुदंड सीधा रखें। बाँये हाथ के ऊपर दाहिने हाथ को रखें। दोनों हाथ नाभि के नीचे पेट से सटाकर रखें नेत्रों को कोमलता के साथ बन्द करें। ध्यान आज्ञाचक्र पर अभ्यास पूर्व मुद्राओं की भाँति करें।

बन्ध (Ligament)

योगासन, प्राणायाम एवं बन्धों के द्वारा हमारे शरीर से जिस शक्ति का प्रादुर्भाव होता है, उसे रोककर अंतर्मुखी करते हैं। बन्ध का अर्थ ही है बाँधना, रोकना। ये बन्ध प्राणायाम में अत्यंत सहायक होते हैं। बिना बन्ध के प्राणायाम अधूरे होते है। इन बन्धों का वर्णन निम्न प्रकार है।

1. जालन्धर बन्ध

पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर श्वाँस को अंदर भर लीजिए। दोनों हाथों को घुटनों पर टिका दीजिए। अब ठोड़ी को थोड़ा नीचे झुकाते हुए कंठकूप में लगाना जालन्धर बन्ध कहलाता है। दृष्टि भ्रूमध्य में स्थित कीजिए। सीना आगे की ओर तना हुआ रहेगा। यह बंध गले के नाड़ी जाल समूह को बाँधे रखता है।

लाभ

1. कण्ठ मधुर व सुरीला होता है।

2. गले के सभी रोगों यथा थायराइड, टांसिल आदि में लाभ मिलता है।

2. उड्डियान बन्ध

जिस क्रिया से प्राण उठकर सुषुम्ना में प्रविष्ट हो जाये, उसे उड्डियान बन्ध कहते हैं। खड़े होकर सहज भाव से दोनों हाथों को घुटनों पर रखिए। श्वाँस बाहर निकालकर पेट को ढीला छोड़िये। जालन्धर बन्ध लगाते हुये छाती को थोड़ा ऊपर की ओर उठाइये। पेट को कमर से लगा दीजिए। यथाशक्ति जितनी देर बन्ध को लगा सकते हैं, लगाइए ।

पुनः श्वाँस लेकर पूर्ववत् दोहरायें। प्रारम्भ में तीन बार करना ही पर्याप्त है। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाया जा सकता है। इसी प्रकार इस बन्ध को पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर भी लगाया जा सकता है।

लाभ

1. पेट सम्बन्धी सभी रोगों को दूर करता है।

2. प्राणों को जागृत कर मणिपूर चक्र का शोधन करता है।

3. मूलबन्ध

सिद्धासन अथवा पदमासन में बैठ जायें। गहरी श्वाँस भरिए। आंतरिक कुम्भक करते हुये गुदाभाग

तथा मूत्रेन्द्रिय को ऊपर की ओर आकर्षित करें। इस बन्ध में नाभि के नीचे वाला हिस्सा खिँच जायेगा। वैसे इस बन्ध को बाह्य कुम्भक के साथ लगाने में सुविधा रहती है। इसका गहन अभ्यास किसी प्रशिक्षित योगी के सान्निध्य में ही करना चाहिए।

लाभ

1. यह बन्ध बवासीर रोग में अत्यंत लाभकारी है।

2. जठराग्नि को तीव्र करता है।

3. ब्रह्मचर्य के लिये यह बन्ध अत्यंत लाभकारी है।

4. महाबन्ध

पदमासन, सिद्धासन या किसी भी ध्यानासन में बैठकर तीनों बन्धों को एक साथ लगाना महाबन्ध कहलाता है। इससे तीनों बन्धों का लाभ एक साथ मिल जाता है। इन तीनों बन्धों को एक साथ बाह्य कुम्भक में ही लगाना चाहिए।

लाभ

1. प्राण उर्ध्वगामी होता है।

2. वीर्य की शुद्धि तथा बल की वृद्धि होती है।

3. महाबन्ध से इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना का संगम होता है।

शुद्धि क्रियाएँ

Pure Action

शरीर की शुद्धि सामान्यत: दो प्रकार से होती है। बाह्य शुद्धि स्नानादि के माध्यम से करते हैं। जबकि शरीर का आंतरिक शुद्धिकरण जो वास्तविक शुद्धिकरण होता है अत्यंत आवश्यक है। बिना शुद्धि के शरीर को निरोगी व स्वस्थ बनाये रखना कठिन है। इसलिए शरीर का शोधन, विकार व रोगों की निवृत्ति आवश्यक है। शरीर के शुद्धिकरण से व्यक्ति के विचारों में पवित्रता का समावेश होता है।

शरीर के शुद्धिकरण के लिए योग में षट् कर्म क्रमशः धौति, वस्ति, नेति, नौलि, त्राटक व कपालभाति बताये गये हैं। इन षट्कर्मों को किसी प्रशिक्षित साधक द्वारा तथा उसकी देखरेख में ही सीखना व करना चाहिए। ये छः शुद्धि क्रियाएँ परम स्वास्थ्य वर्धक होती हैं। इस भाग में केवल निम्न दो शुद्धि क्रियाओं का ही अध्ययन करेंगे।

1. कपालभाति

कपाल का अर्थ मस्तिष्क तथा भाति का अर्थ है- आभा, दीप्ति, तेज या प्रकाश अर्थात जिस क्रिया को करने से माथे पर आभा, तेज व ओज बढ़ता हो उसे कहते हैं- कपालभाति ।

विधि

पदमासन या सिद्धासन में बैठकर अपने श्वाँस को शांत करें। फिर पूरी शक्ति से श्वाँस को नासिका मार्ग से बाहर फेंके। श्वाँस लेने का प्रयास न करें। इस क्रिया को पहले धीरे-धीरे तथा अभ्यास के उपरांत गति भी बढ़ा सकते हैं। प्रारम्भ में 10 से 15 बार करें तथा अभ्यास बढ़ाकर 50 से 60 तक ले जायें। इस क्रिया को करते समय जब थकान का अनुभव करें तो बीच-बीच में विश्राम कर लें। समय की दृष्टि से पहले 2 मिनट से प्रारम्भ कर 5 मिनट तक ले जा सकते हैं। प्रारम्भ में पेट या कमर में दर्द हो सकता है। धीरे-धीरे स्वयं मिट जायेगा।

लाभ

1. माथे, मस्तिष्क व मुख पर ओज, तेज, आभा व सौन्दर्य बढ़ता है।

2. कफ, दमा, श्वाँस, एलर्जी, साइनस आदि रोग नष्ट हो जाते हैं।

3. हृदय एवं फेफड़े शक्तिशाली होते हैं।

4. मोटापा, मधुमेह, गैस, कब्ज, अम्ल, पित्त आदि रोग दूर होते हैं।

5. कब्ज रोग में विशेष लाभकारी है।

6. मन स्थिर, प्रसन्न व शांत रहता है।

7. नकारामक विचारों से मुक्ति मिलती है।

2. त्राटक क्रिया

एकाग्रचित्त होकर, निश्चल दृष्टि से किसी सूक्ष्म लक्ष्य को एकटक तब तक देखते रहना जब तक नेत्रों से आँसू न निकलने लगे, इसी क्रिया को योग की भाषा में त्राटक क्रिया कहते हैं।

विधि-

सुखासन में बैठकर धातु या पत्थर से बनी हुई छोटी वस्तु अथवा कागज पर काला बिन्दू या’ ॐ बनाकर दीवार पर टाँग दें। इसकी आँखों से दूरी 5 से 7 फुट होनी चाहिए। मोमबत्ती या तेल या घी का दीपक जलाकर इस बिन्दु के सामने रखें। यह आँखों के समानान्तर हो। अब इस बिन्दु को बिना पलक झपकाये एकटक तब तक देखते रहें जब तक आँखों से आंसू न निकलने लगे या आँखों में जलन न होने लगे। इस क्रिया को रात्रि में अंधेरे में ही करना चाहिए। संपूर्ण ध्यान लक्ष्य पर ही रहना चाहिए। त्राटक का समय धीरे-धीरे बढ़ायें अभ्यास के उपरांत इसे एक घंटे तक भी किया जा सकता है।

लाभ-

1. नेत्र विकार दूर होते हैं।

2. दृष्टि तीव्र व दूरदर्शी हो जाती है।

3. तन्द्रा, निद्रा व आलस्य दूर भागते हैं।

4. संकल्प दृढ़ इच्छाशक्ति प्रबल होती है।

5. दूसरों के हृदय के विचारों को जानने की शक्ति प्रबल होती है।

3. नौलि क्रिया





1. दोनों पैरों में एक फुट का अंतर व पैरों को समानान्तर रखकर खड़े हो जायें। दोनों हाथों को घुटने के कुछ ऊपर जंघाओं पर रखें। पहिले उड्डियान बन्ध का अभ्यास करें। श्वाँस को पूर्णतः बाहर निकालकर पेट को अंदर चिपकाते हुये कुंभक करें। इसके पश्चात अग्निसार क्रिया करें। श्वांस को बाहर निकालकर बाह्य कुभक करते हुये पेट को बार-बार पिचकायें और फिर पेट को ढीला छोड़ दें।

2. दोनों हथेलियों को जंघाओं के ऊपरी भाग पर रख लें। पेट को ढीला रखते हुये दायें हाथ की हथेली पर जोर डालते हुए जंघा के ऊपर से घुटने की ओर ले जायें और नौलि को दाँयी ओर निकालने का प्रयास करें। इसी प्रकार से बाँयी ओर नौलि को निकालने का प्रयास करें। जब बाँया हाथ नीचे आ जाये तो दाँये हाथ को दबाये बगैर ऊपर ले जायें, इस प्रकार दाँयी और बाँयी ओर बार-बार करें। इससे कुछ दिनों में ही दाँयी व बाँयी नौलि निकलना आरम्भ हो जायेगी।

3. इसके पश्चात दोनों हाथों को जंघाओं के ऊपरी भाग पर रख लें। दोनों हथेलियों से जंघाओं पर दबाव डालते हुए घुटने तक हाथ ले जायें और पेट को ढीला रखते हुये बीच की नौलि को निकालने का प्रयास करें। फिर हाथों को बिना जोर डाले हुये ऊपर ले आयें। यह क्रिया बार-बार करें। कुछ दिनों के उपरांत ही मध्य नौलि निकालना आरम्भ हो जायेगी। अभ्यास के उपरांत हाथों को ऊपर नीचे ले जाने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। नौलि तेजी से दाँये एवं बाँये घूमेगी।

नोट

1. नौलि की सभी क्रियाएँ श्वाँस को बाहर निकालकर बाह्य कुम्भक में ही करनी चाहिए। 2. नौलि क्रिया का अभ्यास किसी प्रशिक्षित प्रशिक्षक के सान्निध्य में ही करना चाहिये, स्वयं नहीं।

लाभ-

1. इस क्रिया से आँतों में चिपका हुआ मल साफ होता है। कब्ज दूर होता है। पेट का मोटापा कम होता है।

2. मंदाग्नि दूर होती है। लीवर, क्लोम व प्लीहा ग्रन्थियाँ प्रभावित होती है।

3. वात, पित्त, कफ तीनों प्रकार के दोष शांत होते हैं।

4. पेट हल्का रहता है, अच्छी भूख लगती है, शरीर स्वस्थ रहता है। मन प्रसन्न रहता है।