प्राकृतिक एवं मानवीय पर्यावरण
06/08/2021 By shiv3376 0

Natural and Human Environment

प्राकृतिक एवं मानवीय पर्यावरण

Natural and Human Environment

पर्यावरण हमारे जीवन का मूल सहायक तंत्र है। यह हमें साँस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी और रहने के लिए भूमि देता है।

यह हमें प्राकृतिक संसाधन जैसे लकड़ी ईंधन, ऊर्जा, खनिज इत्यादि भी उपलब्ध कराता है। अधिकांश मानवीय गतिविधियों किसी न किसी प्रकार से पर्यावरण को प्रभावित करती है।

संसाधन;

जैसे- वन, चरागाह और खेत इनका अत्यधिक प्रयोग करने के कारण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। यदि हमने यह करना जारी रखा तो क्षति अपूर्णीय हो जायेगी और इसके परिणाम भयंकर होंगे।

पर्यावरण का अर्थ (Meaning of Environment)

“पर्यावरण शब्द फ्रेंच के ‘environ’ लिया गया है जिसका अर्थ है, घेरना इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है चारों ओर से घेरना। एक स्थान का पर्यावरण आस-पास की उन स्थितियों को कहा जा सकता है जो पौधों, जीवों और मानवों के अस्तित्व को प्रभावित करती हैं।

उदाहरण के लिए यदि कहीं पौधे उगते हैं तो इसका पर्यावरण जल, भूमि, वायु, ऊष्मा, सूर्य के प्रकाश और इसके आसपास की सभी सजीव वस्तुओं जैसे पौधों, वृक्षों, जीवों और मानवों से निर्मित होगा। ये सभी तत्व पौधे का पर्यावरण है।

प्राकृतिक और मानवीय पर्यावरण (Natural and Human Environment)

पर्यावरण निर्जीव या भौतिक तत्वों,

जैसे-

जल, भूमि, वायु, ऊष्मा व सूर्य के प्रकाश जैसे अन्य तत्वों और साथ-साथ पौधों, जीवों और मानवों से मिलकर बनता है।

पर्यावरण को अक्सर दो प्रकारों में बांटा जाता है प्राकृतिक और मानवीय प्रथम प्रकृति प्रदत्त है तो दूसरा मानव निर्मितः

प्राकृतिक पर्यावरण

प्राकृतिक पर्यावरण

1. प्राकृतिक पर्यावरण (The Natural Environment):

इसमें
मैदान
पर्वत
जलवायु
मृदा
प्राकृतिक हरियाली
वन्य जीव इत्यादि आते हैं।

2. मानवीय पर्यावरण (The Human Environment):

इसमें वे सभी वस्तुएँ आती हैं जो मानव निर्मित हैं; जैसे बस्तियाँ, आवासीय स्थल, परिवहन और संचार के साधन, कृषि और उद्योगों का विकास व अन्य सुविधाएँ।

पृथ्वी का पर्यावरण (Environment of the Earth)

पौधे, जीव तथा मानव एक स्थान विशेष के प्राकृतिक पर्यावरण से प्रभावित होते हैं। भूमि पर पर्वत, पठार, मैदान और घाटियाँ हो सकती हैं। जल में छोटे तालाब से लेकर विशाल समुद्रों सहित झीलें और नदियाँ आती हैं।

जैव पर्यावरण में मानव, पशु, पौधे और अन्य संरचनाएँ सम्मलित हैं। भौतिक व जैव पर्यावरण के ये दो घटक एक दूसरे पर निर्भर हैं।

इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। ये अत्यंत जुड़े हुए हैं और हर समय एक दूसरे के प्रति पारस्परिक क्रिया करते रहते हैं। भौतिक या प्राकृतिक पर्यावरण में जरा-सा भी परिवर्तन जैव पर्यावरण में परिवर्तन कर देता है।

मानव और जीवधारियों के अन्य रूप पृथ्वी पर ही है क्योंकि अन्य ग्रहों के बीच केवल पृथ्वी पर ही ऐसा पर्यावरण है जो जीवन की वृद्धि में सहायक है।

पृथ्वी का ताप न तो बुध और शुक्र के समान अत्यंत उच्च है और न ही बृहस्पति व शनि के समान अत्यंत निम्न ताप में भिन्नता पृथ्वी के पर्यावरण पर निर्भर करती है।

पृथ्वी को घेरे हुए वायु परत में आक्सीजन होती है जो जीवन के सभी रूपों के लिए आवश्यक है। वायु पृथ्वी के तापमान का भी अनुकूलन करती है।

यह अनुकूलन जल को द्रवीय रूप में ही रखता है। जल पशु, पौधों और मानवों के जीवन को वृद्धि देता है। पृथ्वी का एक अद्वितीय पर्यावरण है। यहीं एक ऐसा ग्रह है जहाँ पर जीवन विभिन्न रूपों में है।

पर्यावरणों में भिन्नता (Difference in Environment)

पर्यावरण सभी स्थानों पर समान नहीं हो सकता। इसलिए सभी स्थानों पर भौतिक व जैव परिस्थितियाँ समान नहीं होती। उदाहरण के लिए–

मैदान, पर्यंत, जलवायु, मृदा, प्राकृतिक हरियाली, वन्य जीव, प्राकृतिक संसाधन इत्यादि जो एक रेगिस्तानी स्थल के प्राकृतिक पर्यावरण का निर्माण करते हैं, एक भूमध्य रेखा के प्राकृतिक पर्यावरण से भिन्न होंगे। यह टुंद्रा के प्राकृतिक पर्यावरण से भी भिन्न होगा।

पर्यावरण में समय के साथ भिन्नता (Change of Environment with Time)

पर्यावरण भी भिन्न समय पर भिन्न होता है। यह स्थाई नहीं रहता। यह समय के साथ बदलता रहता है। बदलने की दर तेज अथवा मंद हो सकती है। वह उन कारकों पर निर्भर करता है जो परिवर्तन लाते हैं। भौतिक व जैव पर्यावरण के तत्व बदलते रहते हैं।

अतः यह परिवर्तन होता है। परिवर्तन सभी स्थानों पर देखा जा सकता है,

उदाहरण के लिए चट्टाने अपघटित होकर मृदा में बदल जाती हैं। पृथ्वी की सतह के गुण बदलते रहते हैं, मौसम व ऋतुएँ भी बदलती रहती हैं। समय के साथ पर्यावरण भौतिक व जैव तत्वों की गतिशीलता के कारण बदलता रहता है। पृथ्वी की आंतरिक हलचल के झरण भूकंप, ज्वालामुखी, दरारे व कंपन उत्पन्न होती हैं।

ये कारक कम समय में ही भूमि के रूपों में बड़ा अंतर कर देते हैं। दूसरी ओर बहते पानी व हवा से मृदा क्षरण जैसे कारकों के कारण पर्यावरण में धीमे और क्रमिक परिवर्तन होते हैं। पहले कभी हिमालय के स्थान पर एक सागर होता था जिसे टेचीस सागर कहते थे, यहाँ पर समुद्रीय पर्यावरण था।

भौतिक व जैव पर्यावरण में सम्बंध (Relationship of Physical and Biological Environment)

मानव अपनी मूल आवश्यकताएँ प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों से करता है। जब वह संसाधनों का दोहन करता है परिस्थितियों बदलती है और भौतिक पर्यावरण बदल जाता है। इस प्रकार से जैव पर्यावरण भौतिक पर्यावरण को प्रभावित करता रहता है। कांगों नदी की खाड़ी में रहने वाली पिग्मी जाति के अध्ययन से हम पाते हैं कि उनके शरीर का आकार और

जीवन शैली भौतिक पर्यावरण द्वारा संचालित होती हैं, जबकि उनकी खाद्य और आर्थिक शैली जैव पर्यावरण द्वारा संचालित होती है। सम्पूर्ण रूप में उनका जीवन दोनों पर्यावरणों पर निर्भर है। अत्यधिक वर्षा, घने वन और उच्च ताप उन्हें वृक्षों पर रहने के लिए विवश करते हैं। फसल के लिए अनुपयोगी भूमि और वृक्षों तथा जानवरों की अधिकता के कारण उन्होंने लकड़हारे व शिकारी का व्यवसाय अपना लिया है।

इस प्रकार से भौतिक पर्यावरण जैव पर्यावरण को प्रभावित करता है। जैव पर्यावरण भी भौतिक पर्यावरण से प्रभावित होता है।

परिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem)

पशु एवं पौधों का पर्यावरण, जिसमें वे रहते हैं, एक परिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। एक परिस्थितिकी तंत्र छोटे तालाब जितना छोटा एवं विशाल वन अथवा सागर के समान बड़ा होता है। एक परिस्थितिकी तंत्र में सजीव अधिक या कम आत्मनिर्भर हो सकते हैं। उनका लगभग सारा भोजन ऊर्जा परिस्थितिकी तंत्र के भीतर से ही आता है।

उदाहरण

के लिए पौधे जिन्हें उत्पादक कहा जाता है, अपना भोजन सूर्य के प्रकाश व वायु द्वारा स्वयं बनाते है। ये पीथे पक्षियों व शाकाहारी पशुओं, जिन्हें प्राथमिक उपभोक्ता कहते हैं, का भोजन है। ये पक्षी तथा पशु जो अन्य पक्षियों तथा पशुओं का भोजन करते हैं द्वितीयक उपभोक्ता कहलाते हैं।

पौधों व जीवों के मृतावशेष कवक व जीवाणुओं, जिन्हें अपघटक कहते हैं, द्वारा उपयोगी पदार्थों में तोड़े जाते हैं जो पौधे भूमि से लेते हैं।

परिस्थितिकीय संतुलन (Biological/Ecological Balance)

परिस्थितिकी तंत्र के तत्व एक संतुलन की स्थिति बनाए रखते हैं जिसे परिस्थितिकी संतुलन कहा जाता है। इन तत्वों की प्रकृति में परिवर्तन इस संतुलन को बिगाड़ देता है। यह एक नए परिस्थितिकी तंत्र को जन्म देता है।

पर्यावरण सजीवों को कई प्रकार से प्रभावित करता है। ताप उस दर को प्रभावित करता है जिस पर सजीव वृद्धि और गुणन करते हैं; प्रकाश, वायु और मृदा के प्रकार पौधों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं जो पशुओं का मुख्य आहार है।

यदि पौधों की वृद्धि असामान्य रूप से कम हो जाती है तो यह शाकाहारियों की संख्या में कमी कर देती है जिससे मांसाहारी भी प्रभावित होते हैं।

इस प्रकार से एक परिवर्तन से कई परिवर्तन हो जाते हैं जो संतुलन को बिगाड़ देते हैं।

असंतुलित परिस्थितिकी तंत्र के
कारण ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं

जो मानवों के लिए
लाभदायक और हानिकारक
दोनों हो सकती हैं।

पर्यावरण की आवश्यकता (Need of Environment)

मानव जीवन के विकास के लिए पर्यावरण का अध्ययन आवश्यक है। मानव जैव पर्यावरण का एक अभिन्न अंग है, उसका जीवन भौतिक पर्यावरण की स्थितियों पर बहुत निर्भर है।

उसके जीवन की प्रतिक्रियाएँ पर्यावरण द्वारा ही संचालित होती हैं। जो भी उसे जीवन के विकास के लिए आवश्यक होता है वह उसे पर्यावरण में उपलब्ध तत्वों से प्राप्त होता है।

अपनी बुद्धि के प्रयोग द्वारा कई स्थानों के पर्यावरण को बदल देता है जिससे वे उसके रहने के लिए उपयुक्त बन जाते हैं।

मानव की प्रतिक्रियाओं ने पहले भी कुछ पर्यावरणों को बुरी तरह प्रभावित किया है परंतु वे परिवर्तन उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक थे।

पर्यावरण में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिवर्तन परिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर देते हैं और इस प्रकार से कई समस्याओं का जन्म होता है।

इसलिए हमें पर्यावरण के अध्ययन की आवश्यक होती है ताकि हम अनुकूलन के विभिन्न तरीके खोजें और पर्यावरण में संतुलन बनाए रखें। मृदा क्षरण और बाढ़े वृक्षों को निरंतर काटे जाने के परिणाम हैं।