योग शिक्षा YOGA EDUCATION
29/07/2021 By shiv3376 0

YOGA EDUCATION

योग का अर्थ Meaning of Yoga

योग का अर्थ Meaning of Yoga

YOGA EDUCATION योग क्या है what is yoga

योग शब्द संस्कृत की ‘युज धातु’ से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना, समन्वय करना या भावात्मक एकत्व लाना। जोड़ने के इस कार्य को हम अपने पारिवारिक जीवन में भी स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। यथा- जब हम स्वयं को अपनी माँ के साथ जोड़ते हैं तो माँ-बेटा या माँ-बेटी का योग होता है। इसी प्रकार बहिन के साथ भाई-बहिन, या बहिन-बहिन तथा पिता के साथ पिता-पुत्र या पिता-पुत्री के सम्बन्धों को योग के रूप में देख सकते हैं।

वेदान्त के अनुसार

परन्तु वेदान्त के अनुसार योग इससे आगे जाता है। “योगी याज्ञवल्क्य” कहते है। कि “जीवात्मा और परमात्मा को एक होने का अनुभव करने का नाम ही योग है।” योग हमें अपने अंतर में झांकने के लिये प्रवृत्त करता है। योग का मार्ग कठिन अवश्य है परन्तु ऐसा नहीं है कि जिसे निष्ठापूर्वक सतत प्रयास से प्राप्त न किया जा सके।

योग की परिभाषा

विभिन्न योगाचार्यों ने योग को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है

1. मनु एवं याज्ञवल्क्य के अनुसार,

योग उन सभी क्रियाओं का समग्र स्वरूप है जिसके अनवरत् अभ्यास से मोक्ष की प्राप्ति संभव है।”

2. पुराणों में योग के संदर्भ में कहा गया है

योग आत्मदर्शन का एक सफल साधन है।”

3. महर्षि पंतजलि के अनुसार

चित्त की प्रवृत्तियों का निरोध ही योग है।”

संक्षेप में कहा जा सकता है कि शारीरिक एवं मानसिक अभ्यास के द्वारा मन एवं शरीर का आत्मसाक्षात्कार करा देना ही योग है। व्यावहारिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि मानसिक प्राणिक, शारीरिक व आध्यात्मिक विकास का क्रम ही योग है।

योग के अंग Type of Yoga

हमारे ऋषि मुनियों ने योग के द्वारा शरीर, बुद्धि, मन और प्राण की शुद्धि तथा प्रभु प्राप्ति के लिये आठ प्रकार के साधन बताये हैं जिन्हें अष्टांग योग कहते हैं। ये निम्न हैं

(1) यम (2) नियम (3) आसन (4) प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) धारणा (7) ध्यान (8) समाधि।

1. यम

सभी के प्रति समान दृष्टि, सद्भाव व सभी के प्रति उचित व्यवहार करना यम के अन्तर्गत आता है। इसके पालन से जीवन में सात्विकता आती है और जीवन अलौकिक बनता है। यम पाँच होते हैं

(I) अहिंसा

समस्त प्राणियों तथा जीवों से प्रेम करना अहिंसा है। दूसरे शब्दों में मन, वचन, कर्म द्वारा किसी भी

प्राणी को कष्ट न पहुँचाने की भावना अहिंसा है।

(II) सत्य-

जैसा आँखों ने देखा, कानों ने सुना, तथा मन ने समझा, वैसा ही कह देना सत्य है। इसका अर्थ है सत्य केवल वाह्य रूप से ही नहीं आंतरिक रूप से भी होना चाहिए।

(iii) अस्तेय-

मन, वचन व कर्म से चोरी न करना, दूसरों के धन का लालच न करना ही अस्तेय कहलाता है।

(iv) ब्रह्मचर्य

अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में रखना ही ब्रह्मचर्य होता है। मन एवं वाणी पर संयम भी इसी के अंतर्गत आता है।

(v) अपरिग्रह-

अपरिग्रह के अन्तर्गत उस प्रकार के त्याग को माना गया है जो अनायास ही प्राप्त हो जाता है। अस्तेय

में दान को ग्रहण किया जाता है परन्तु अपरिग्रह में दान भी अस्वीकार किया जाता है।

2. नियम

नियम निम्नलिखित पाँच प्रकार के होते हैं

(I) शौच

तन व मन की पवित्रता शौच के अन्तर्गत आती है। शरीर की शुद्धि के लिये स्नान, सात्विक भोजन व षट्कर्म आदि की आवश्यकता होती है। मन की आंतरिक शुद्धि, राग व द्वेष आदि को त्यागकर मन की वृत्तियों को निर्मल करने से होती है।

(ii) संतोष

ईश्वर ने जो हमें दिया है, उससे संतुष्ट होना तथा अपने कर्तव्य का उचित रूप से पालन करना ही संतोष

(ii) तप-

प्रत्येक परिस्थिति में सभी प्रकार के कष्टों को सहन करते हुये कर्म में प्रवृत्त रह कर मन व शरीर साधना

(iv) स्वाध्याय विचार-

शुद्धि व ज्ञान प्राप्ति के लिये धर्मशास्त्रों का अध्ययन शिक्षा का सतत अभ्यास तथा सत्संग व विचारों का आदान प्रदान ही स्वाध्याय है।

(v) ईश्वर प्राणिधान-

परमपिता परमेश्वर की मन, वचन व कर्म से भक्ति व उसके नाम का सर्वत्र गुणगान, मनन तथा प्रत्येक कार्य में ईश्वर का अनुभव करना ईश्वर प्राणिधान है।

3. आसन

आसन शारीरिक शक्ति व सौष्ठव को अस्तित्व में रखते हैं। अपनी संपूर्ण इन्द्रियों पर नियंत्रण आसन के द्वारा ही संभव है। गंदी एवं अशोभनीय भावनाओं पर नियंत्रण और शुभ भावनाओं के प्रकटीकरण में आसनों का बहुत बड़ा योगदान है। उक्त सभी उपलब्धियों के लिये आसनों का प्रतिदिन सतत अभ्यास सुन्दर कार्य करता है। योगासन शरीर को पुष्ट करते हैं। आलस्य, सुस्ती व प्रमाद को हटाने के लिए आसन अति महत्वपूर्ण हैं। यदि हमें मानसिक स्थिरता चाहिए तो आसन आवश्यक हैं। आसन के माध्यम से चेहरे पर एक अलौकिक तेज चमकने लगता है।

4. प्राणायाम

महर्षि पतञ्जलि ने कहा है, “श्वास प्रश्वासयो, गति विच्छेदः प्राणायामः ।” अर्थात् प्राण की स्वाभाविक गति श्वाँस-प्रश्वाँस को रोकना ही प्राणायाम है। वायु संजीवनी है, वायु प्राण है अतः प्राणायाम सभी के लिये उपयोगी है। प्राणायाम से शरीर के विकार, मन के आवश्यक तनाव दूर होते हैं। दीर्घतम जीवन जीने का सर्वोत्तम उपाय प्राणायाम होता है। प्राणायाम के संदर्भ में कहा भी गया है

अदभुत शक्ति स्रोत है, साधन प्राणायाम। नवजीवन संजीवनी, अलौकिक पूरण काम।।

5. प्रत्याहार

मन की चंचलता को विभिन्न प्रकार के विषयों में विहार करने से रोकना प्रत्याहार है। मन की चंचलता किसी से छिपी नहीं होती। मन न जाने कहाँ-कहाँ भटकता फिरता है। इसे नियंत्रित करना आवश्यक है। भिन्न-भिन्न प्रकार के आलस्य तथा प्रमाद मनुष्य के चारों ओर घेरा बनाये रखते हैं। आलस्य व प्रमाद से स्वयं का बचाये रखना प्रत्याहार के अंतर्गत आता है। मानव को हर समय सात्विक रहना तथा उसका निरीक्षण करना साधना की दिव्य औषधि है। साधना के सतत अभ्यास से ही प्रत्याहार का लाभ मिलता है अतः कहा जा सकता है कि सात्विक व मन से निर्मल हुआ प्राणी अपने इष्ट के ध्यान में स्वयं को पूर्ण रूप से ध्यानस्थ करने का प्रयास करे, वही प्रत्याहार कहलाता है।

6. धारणा

चित्त में किसी एक विषय को धारण करके उसी पर ध्यान को केन्द्रित करना और स्वयं की वृत्ति को सात्विक बनाये रखना’ धारणा’ है। चित्त की मूढ़ता को धारणा द्वारा वश में किया जाता है। तमो व रजो गुणों पर विजय प्राप्त करना ही धारणा का मूल तत्व है।

7. ध्यान

अपने मन को निरंतर एक ही शुद्ध सात्विक वृत्ति में लगाये रखना ध्यान के अन्तर्गत आता है। ध्यानबिन्दु उपनिषद में कहा गया है कि पर्वत जैसे ऊँचे और विस्तीर्ण पाप का भी ध्यान द्वारा भेदन किया जा सकता है। अन्य किसी उपाय से नहीं। ध्यान की स्थिरता अभ्यास से आती है। मन की चंचलता ध्यान के सतत अभ्यास से ही दूर होती है।

8. समाधि

मन का लय करके चित्त जब परमात्मा में लीन हो जाता है, उसे समाधि कहते हैं। समाधि ध्यान की चरम सीमा होती है। समाधि की अवस्था में पहुँचने के लिये ध्यान का अत्यधिक अभ्यास करना पड़ता है। ध्यान अवस्था में ध्यान ध्येय वस्तु तथा ध्याता अलग-अलग प्रतीत होते हैं परन्तु समाधि में ध्येय वस्तु ही शेष रहती है। ध्यान, ध्याता तथा ध्येय .तीनों एकाकार हो जाते हैं बड़े सौभाग्यशाली व्यक्ति ही इस अवस्था के अधिकारी होते हैं।